वीआईपी कल्चर के खिलाफ नेपाल की पहल?, मंत्रियों की कारों के काफिले नहीं चलेंगे?

By विश्वनाथ सचदेव | Updated: April 16, 2026 05:29 IST2026-04-16T05:29:08+5:302026-04-16T05:29:08+5:30

लाल और नीली बत्तियों वाले यह काफिले उस संस्कृति का एक चेहरा हैं जिसे आम बोलचाल की भाषा में ‘वीआईपी कल्चर’ यानी विशिष्ट लोगों की व्यवस्था कहा जाता है.

Nepal's initiative against VIP culture no convoys ministers cars not sound sirens running roads blog Vishwanath Sachdev | वीआईपी कल्चर के खिलाफ नेपाल की पहल?, मंत्रियों की कारों के काफिले नहीं चलेंगे?

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Highlightsकाफिले सायरन बजाते, धूल उड़ाते आम आदमी को अंगूठा दिखाते, सड़कों पर आगे निकल जाते हैं.सुरक्षा के नाम पर ऐसी व्यवस्था की गई है कि किसी मंत्री की कार को ‘अकेले’ कहीं आना-जाना न पड़े.शानदार और महंगे अस्पताल हैं. यह बच्चे सरकारी स्कूलों में भी नहीं पढ़ते. सरकारी स्कूल तो आम आदमी के लिए होते हैं.

खबर मध्य प्रदेश के रायसेन में सांची रोड पर हुई एक सड़क दुर्घटना की है. इस दुर्घटना में एक छोटे पत्रकार की मृत्यु हो गई.  बताया जा रहा है कि घायल को अस्पताल पहुंचाने के लिए समय पर एंबुलेंस नहीं मिल पाई, अन्यथा पत्रकार की जान शायद बच सकती थी. इस तरह की कोई अनोखी घटना नहीं है यह. अक्सर होता रहता है ऐसा. अक्सर आम आदमी को एंबुलेंस-सेवा का समय पर लाभ नहीं मिल पाता. अक्सर मंत्रियों की कारों के काफिले सायरन बजाते, धूल उड़ाते आम आदमी को अंगूठा दिखाते, सड़कों पर आगे निकल जाते हैं.

लाल और नीली बत्तियों वाले यह काफिले उस संस्कृति का एक चेहरा हैं जिसे आम बोलचाल की भाषा में ‘वीआईपी कल्चर’ यानी विशिष्ट लोगों की व्यवस्था कहा जाता है. राजनीति में इस व्यवस्था का चेहरा अक्सर दिख जाता है. सुरक्षा के नाम पर ऐसी व्यवस्था की गई है कि किसी मंत्री की कार को ‘अकेले’ कहीं आना-जाना न पड़े.

उनकी गाड़ी के आगे भी गाड़ियां होती हैं, पीछे भी. माना जाता है इससे शासक का रुतबा बढ़ता है! रुतबे वाली इस राजनीतिक संस्कृति की पहचान सिर्फ कारों का काफिला नहीं होती. ‘बड़े लोग’ कई-कई तरीकों से अपना बड़ा होना सिद्ध करने की कोशिश में लगे रहते हैं. जैसे कथित बड़े लोगों के बच्चे सरकारी अस्पतालों में नहीं पैदा होते.

उनके लिए शानदार और महंगे अस्पताल हैं. यह बच्चे सरकारी स्कूलों में भी नहीं पढ़ते. सरकारी स्कूल तो आम आदमी के लिए होते हैं. सरकारी अफसरों, राजनेताओं, पैसे वालों के बच्चों के लिए वीआईपी कल्चर में खास स्कूल होते हैं. खास यानी महंगे. हां, इनका महंगा होना इनकी पहली पहचान और खासियत है.

मजे की बात यह है कि इसकी अक्सर आलोचना होती है, इसे समाप्त करने के वादे और दावे भी किए जाते हैं, पर व्यवहार में ऐसा होता नहीं दिखता. दिखना चाहिए. हमारे पड़ोसी राष्ट्र नेपाल की नई सरकार ने एक रास्ता दिखाया है इस विशिष्ट ‘संस्कृति’ वाली मानसिकता को समाप्त करने का. इसी मार्च 2026 में वहां चुनाव हुए थे.

इस चुनाव के बाद एक ऐतिहासिक बदलाव आया है वहां की राजनीति में. देश के नए और युवा प्रधानमंत्री 36 वर्षीय बालेन शाह ने दशकों पुराने राजनीतिक दलों का वर्चस्व ही समाप्त नहीं किया, एक समतावादी राजनीतिक संस्कृति को स्थापित करने का संकल्प भी लिया है. देश में आदेश जारी कर दिया गया है कि मंत्रियों की कारों के काफिले नहीं चलेंगे, सड़कों पर दौड़ती उनकी कारें सायरन नहीं बजाएंगी,

यातायात नियमों का उल्लंघन करने वाला चाहे कोई भी हो, उसके साथ कानून एक जैसा व्यवहार करेगा. एक बड़ा बदलाव यह भी है कि अब नेपाल में बच्चे, चाहे वे  मंत्री के हों या संत्री के, सामान्य कर्मचारियों के अथवा किसी अफसर के, सरकारी स्कूल में ही पढ़ेंगे. वीआईपी कल्चर समाप्त करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है,

और यदि सफल हो जाता है तो छोटा-सा देश नेपाल समतावादी समाज की रचना की दिशा में एक बड़ा उदाहरण प्रस्तुत करेगा. उम्मीद की जानी चाहिए कि यह कोशिशें सफल होंगी. ऐसी कोई भी सफलता हमारे लिए मार्गदर्शन का काम कर सकती है. आम नागरिक को भी यह समझना होगा कि बड़ा होने और बड़ा दिखने में अंतर है. लाल बत्ती वाली संस्कृति हमें बड़ा नहीं, छोटा बनाती है. यह हमें तय करना है कि हम छोटा बनना चाहते हैं या बड़ा.

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