देश के प्रति अथाह प्रेम और सोने से मोहब्बत?, प्रति वर्ष 700 से 800 टन खपत?
By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: May 12, 2026 05:25 IST2026-05-12T05:25:58+5:302026-05-12T05:25:58+5:30
आंकड़ों की भाषा में बात करें तो हमारे आयात बिल में लगभग 9 प्रतिशत हिस्सा सोने का है. स्वाभाविक सी बात है कि हम जितना ज्यादा सोना खरीदेंगे, हमारे आयात बिल पर उतना ही ज्यादा दबाव पड़ेगा.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीयों से आग्रह किया है कि वे कम से कम एक साल की अवधि में सोना नहीं खरीदें. भले ही शादी-ब्याह हो या फिर कोई और अवसर! तकनीकी तौर पर बात तो बिल्कुल सही है. चीन और पोलैंड के बाद भारत दुनिया में सबसे ज्यादा सोना खरीदने वाले देशों में शामिल है. भारत जो सोना खरीदता है, उसका बड़ा हिस्सा आभूषण के रूप में तब्दील हो जाता है.
दूसरे देशों में उतना ज्यादा आभूषण नहीं बनता है. भारत में प्रति वर्ष औसतन 700 से 800 टन सोने की खपत होती है. हमारे देश में सोने का उत्पादन अत्यंत कम है इसलिए स्वाभाविक रूप से हम अपनी जरूरत का 90 प्रतिशत से ज्यादा सोना आयात करते हैं. आयात का मतलब है कि हम इसके लिए विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग करते हैं.
कच्चे तेल के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा आयात खर्च है. आंकड़ों की भाषा में बात करें तो हमारे आयात बिल में लगभग 9 प्रतिशत हिस्सा सोने का है. स्वाभाविक सी बात है कि हम जितना ज्यादा सोना खरीदेंगे, हमारे आयात बिल पर उतना ही ज्यादा दबाव पड़ेगा. इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से सोना नहीं खरीदने का आग्रह किया है.
वैसे आपको जानकर हैरानी होगी कि इस आग्रह से पहले ही सोने के आयात में पिछले महीनों में कमी आई है. जनवरी में भारत ने 100 टन सोना आयात किया था जो फरवरी में घटकर करीब 66 टन और मार्च में करीब 22 टन के आसपास रह गया. अप्रैल में इसमें भी कमी आई है. यदि हम भारतीय एक साल के लिए सोने की खरीदी रोक दें तो सच मानिए कि हमारी सेहत पर भले ही ज्यादा असर नहीं पड़े.
लेकिन देश की सेहत पर बहुत सकारात्मक फर्क आएगा. इस एक वर्ष में हम उस सोने से भी काम चला सकते हैं, जो हमारे पास है. पक्का आंकड़ा तो उपलब्ध नहीं है लेकिन अनुमान यही है कि भारतीय घरों में कम से कम पच्चीस हजार टन सोना तो है ही. इसके अलावा हमारे मंदिरों के पास भी हजारों टन सोना है. दरअसल हम शादी ब्याह के समय सबसे ज्यादा सोना खरीदते हैं.
दुल्हन को सोने के आभूषण देना हमारी परंपरा में भी है और अब बड़प्पन की निशानी भी बन गया है. हालत यह है कि जिनकी क्षमता नहीं है, वे कर्ज लेकर भी सोना खरीदते हैं. एक तरह का आडंबर भी समाज में शामिल होता चला गया है. मगर यह अवसर देश की रक्षा का है. दुनिया जंग से परेशान है.
सौभाग्य से अभी तक हम पर सीधे इसका असर नहीं हुआ है लेकिन हम यदि खुद को मजबूत नहीं करेंगे तो कब तक इसके असर से बचे रहेंगे? कुछ विरोधियों ने सोना न खरीदने के आग्रह को लेकर नरेंद्र मोदी की आलोचना प्रारंभ कर दी है लेकिन इन विरोधियों को समझना होगा कि देश सबसे पहले है, राजनीति कभी भी देश से बढ़ कर नहीं हो सकती. हम जानते हैं कि हमें सोने से मोहब्बत है लेकिन हकीकत यह है कि हमें अपने देश से ज्यादा और अथाह प्रेम है. हम से देश है और देश से ही हम हैं.