महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु थे गोपालकृष्ण गोखले
By कृष्ण प्रताप सिंह | Updated: May 9, 2026 07:03 IST2026-05-09T07:03:43+5:302026-05-09T07:03:43+5:30
1907 में बढ़ते मतभेदों के चलते कांग्रेस अपने सूरत अधिवेशन में नरम दल व गरम दल में विभाजित हुई तो भी गोखले व तिलक अलग-अलग खेमों में थे. अलबत्ता, इससे पहले 1905 में गोखले इन्हीं तिलक के साथ ब्रिटिश सत्ताधीशों के सामने देश की आजादी का पक्ष रखने इंग्लैंड भी गए थे.

महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु थे गोपालकृष्ण गोखले
गोपालकृष्ण गोखले (जिनकी आज जयंती है) राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की सामाजिक-राजनीतिक समझ व सक्रियताओं को आकार व दिशा देने वाले ऐसे शख्स थे, जिन्हें महात्मा ने अपनी आत्मकथा में अपना राजनीतिक गुरु तो माना ही, उन पर गुजराती में लिखी अपनी पुस्तक में ‘धर्मात्मा’ कहकर भी संबोधित किया है. ऐसे ‘धर्मात्मा’, जो उनके साथ मोहम्मद अली जिन्ना के लिए भी उतने ही आदरणीय थे- बाल गंगाधर तिलक की निगाह में ‘भारत के हीरे’, जबकि कई अन्य के निकट ‘आधुनिक दक्षिण एशिया के निर्माता’ की उपाधि के प्रबलतम हकदार. आर्थिक व वित्तीय विषयों की अद्वितीय जानकारी के लिए वे ‘भारत के ग्लैडस्टोन’ कहलाते थे.
इतना ही नहीं, बॉम्बे हाईकोर्ट के जज, प्रसिद्ध इतिहासकार व समाज-सुधारक महादेव गोविंद रानाडे के शिष्य और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सबसे प्रसिद्ध नरमपंथी राष्ट्रवादी राजनीतिज्ञ, बुद्धिजीवी, विचारक व समाज सुधारक भी. विडंबना यह कि उम्र की नाइंसाफी के कारण वे अपने अड़तालीसवें वसंत में ही इस संसार को अलविदा कहने को मजबूर हो गए, लेकिन अंतिम सांस लेने से पहले सामाजिक-आर्थिक सुधारों व स्वतंत्रता संघर्ष के अभियानों में अपने पल-पल का सदुपयोग कर उन्होंने ऐसी दुर्लभ स्वीकार्यता हासिल कर ली थी कि जो स्वतंत्रता सेनानी स्वतंत्रता संग्राम के उनके रास्ते को ठीक नहीं समझते थे, उनके पास भी उनके विरुद्ध कहने के लिए कुछ नहीं हुआ करता था.
इसकी सबसे बड़ी मिसाल यह है कि जो बाल गंगाधर तिलक उन्हें ‘भारत का हीरा’ कहते थे और स्वतंत्रता के लिए विरोध, बहिष्कार और आंदोलन के हिमायती थे, उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि गोखले स्वतंत्रता संघर्ष के संवैधानिक तरीके अपनाने को ही बेहतर मानते हैं. 1907 में बढ़ते मतभेदों के चलते कांग्रेस अपने सूरत अधिवेशन में नरम दल व गरम दल में विभाजित हुई तो भी गोखले व तिलक अलग-अलग खेमों में थे. अलबत्ता, इससे पहले 1905 में गोखले इन्हीं तिलक के साथ ब्रिटिश सत्ताधीशों के सामने देश की आजादी का पक्ष रखने इंग्लैंड भी गए थे. क्योंकि कुशल, प्रभावशाली और तर्कशील वक्ता होने के कारण इस काम के लिए वे तिलक सहित हर किसी की पसंद थे.
इसी तरह महात्मा गांधी को गोखले द्वारा गठित सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी में शामिल होने को लेकर हिचक थी और कुछ मामलों में उनके विचार भी एक-दूसरे से पूरी तरह मेल नहीं खाते थे, लेकिन उन्हें अपना राजनीतिक गुरु स्वीकारने में गांधी को कतई कोई हिचक नहीं थी. गोखले दक्षिण अफ्रीका में गांधी के संघर्षों से प्रभावित होकर उन्हें भारत आकर भारतीयों के लिए संघर्ष करने को प्रेरित नहीं करते, तो हमारे स्वतंत्रता संघर्ष का जाने क्या हुआ होता.
कहते हैं कि मोहनदास करमचंद गांधी के महात्मा बनने में जिन कुछ शख्सियतों का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है, उनमें गोखले का नाम पहला है. अपनी आत्मकथा में महात्मा ने स्वयं गोखले को अपना ‘शेर की तरह बहादुर और विशाल हृदय’ राजनीतिक गुरु स्वीकार किया है. 1896 में 12 अक्तूबर को पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज में उनसे हुई पहली भेंट को याद करते हुए गांधी लिख गए हैं कि गोखले ने उन पर प्रारंभिक प्रभाव डाला और उनके प्रति उनके हृदय में श्रद्धा उत्पन्न हुई.