Nari Shakti Vandan Adhiniyam: महिलाएं राजनीति में सुधार ला सकेंगी?

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: April 17, 2026 05:25 IST2026-04-17T05:25:46+5:302026-04-17T05:25:46+5:30

Nari Shakti Vandan Adhiniyam: संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का मुद्दा दशकों से लंबित है. इसलिए, मैं इस सुधारवादी कदम का स्वागत करता हूं.

Nari Shakti Vandan Adhiniyam Can women bring about reforms in politics blog Abhilash Khandekar | Nari Shakti Vandan Adhiniyam: महिलाएं राजनीति में सुधार ला सकेंगी?

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Highlights2027 या 2029 तक विधानसभाओं में महिलाओं के लिए कोटा लागू हो जाएगा.पूरी प्रक्रिया में कुछ नए मोड़ आ गए हैं, जिनमें परिसीमन प्रमुख है.विधेयक पर चर्चा शुरू की है और संसद का विशेष सत्र आहूत किया गया है.

अभिलाष खांडेकर

‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को फिर से गति देने का मोदी सरकार का निर्णय भले ही महिला राजनेताओं के वास्तविक कल्याण से अधिक एक राजनीतिक कदम प्रतीत हो, लेकिन लोकतांत्रिक समाज के सभी वर्गों द्वारा इसका स्वागत किया जाना चाहिए. इस कदम के समय को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है. संविधान संशोधन विधेयक पेश होने और संसद के दोनों सदनों में तार्किक और सार्थक बहस होने के बाद यह विवाद शायद शांत हो जाए. संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का मुद्दा दशकों से लंबित है. इसलिए, मैं इस सुधारवादी कदम का स्वागत करता हूं.

संविधान का 106वां संशोधन 2023 में पारित हुआ था और तब से यह उम्मीद की जा रही थी कि 2027 या 2029 तक विधानसभाओं में महिलाओं के लिए कोटा लागू हो जाएगा. संविधान संशोधन का पारित होना ऐतिहासिक था, लेकिन पिछले तीन वर्षों से इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है. हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया में कुछ नए मोड़ आ गए हैं, जिनमें परिसीमन प्रमुख है.

अब नए संशोधन (131) को खतरनाक बताया जा रहा है. इस महीने के अंत में होने वाले महत्वपूर्ण पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को देखते हुए, विपक्षी कांग्रेस का कहना है कि भाजपा, जो पूर्वी राज्य में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है, ने महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए विधेयक पर चर्चा शुरू की है और संसद का विशेष सत्र आहूत किया गया है.

बेशक, इस कानून में कई जटिल बाधाएं हैं, जिनमें निर्वाचन क्षेत्रों के भविष्य के परिसीमन और नए कानून निर्माताओं के रूप में मौजूदा सदस्यों के लिए प्रस्तावित 33 प्रतिशत कोटे के भीतर ओबीसी आरक्षण की मांग शामिल है. नए सांसदों की संख्या अब बढ़कर 850 तक होगी. निस्संदेह, आरक्षण से लैंगिक समानता आएगी.

महिला सशक्तिकरण की राजनीतिक अवधारणा को अक्षरशः और भावार्थ रूप से और आगे बढ़ाया जा सकेगा. लेकिन समाज के अन्य वर्गों के लिए और अधिक आरक्षण की मांग हमारे समाज के लिए घातक साबित होगी. सभी दलों के राजनेता लंबे समय से महिला नेताओं और भावी उम्मीदवारों को इस विधेयक का लालच देते आ रहे हैं.

लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि यूपीए और एनडीए (कांग्रेस और भाजपा - जो दल नेता हैं) के गठबंधन इस निर्णायक कानून पर लगभग तीन दशकों से उलझे हुए थे. राजनीतिक इच्छाशक्ति का स्पष्ट अभाव रहा है. डॉ. मनमोहन सिंह ने जरूर  इच्छाशक्ति दिखाई थी और उनकी  सरकार ने मार्च 2010 में राज्यसभा में विधेयक पेश किया था, लेकिन इसे लोकसभा में नहीं ले जा सकी.

अब जबकि प्रधानमंत्री ने दृढ़ संकल्प दिखाया है, ऐसा प्रतीत होता है कि 1996 में देश के कानून निर्माण और शासन व्यवस्था में महिलाओं के साथ सत्ता साझा करने के गंभीर प्रयास के रूप में शुरू हुई यह उतार-चढ़ाव भरी यात्रा अपने गंतव्य के करीब पहुंच रही है. सब ठीक रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हम विधानसभाओं के एक तिहाई हिस्से में विभिन्न पृष्ठभूमि और क्षमताओं वाली जिम्मेदार महिलाओं को देखेंगे.

प्रश्न पूछे जा रहे हैं कि संविधान संशोधन का मूल (या छिपा हुआ) मकसद क्या है? खैर, राजनीतिक दल अब तक इस मुद्दे पर हिचकिचाते क्यों रहे हैं यह समझ से परे है. क्या यह पुरुषों में असुरक्षा भावना थी? या फिर देश को महिलाओं की नेतृत्व क्षमता पर भरोसा नहीं था? पहले सवाल का जवाब शायद न मिले, लेकिन दूसरे सवाल का जवाब आसान है.

ऐसी कई महिलाएं हैं जिन्होंने आरक्षण के अभाव में पुरुष प्रधान चुनावों में जीत हासिल की. सुचेता कृपलानी और इंदिरा गांधी से लेकर नंदिनी सत्पथी, शीला दीक्षित, सुषमा स्वराज, सुमित्रा महाजन, सोनिया और प्रियंका गांधी, जयललिता, ममता बनर्जी, मायावती, उमा भारती, स्मृति ईरानी, सुप्रिया सुले, आनंदीबेन पटेल या फिर ‘बैंडिट क्वीन’ फूलन देवी.

हालांकि फूलन (मिर्जापुर से दो बार सांसद) को स्पष्ट कारणों से अन्य महिलाओं के बराबर नहीं माना जा सकता, लेकिन मेरा तात्पर्य यह है कि भारतीय मतदाताओं ने राजनीतिक क्षेत्र के विभिन्न वर्गों की महिला नेताओं पर भरोसा हमेशा दिखाया है. इस मामले में भारत ने अमेरिका समेत शक्तिशाली, आर्थिक रूप से विकसित पश्चिमी देशों को भी पीछे छोड़ दिया है.

अमेरिका में आज तक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बनी है, लेकिन भारत में प्रतिभा पाटिल और द्रौपदी मुर्मु के रूप में दो राष्ट्राध्यक्ष और मीरा कुमार और सुमित्रा महाजन लोकसभा अध्यक्ष रह चुकी हैं. इंदिरा गांधी ताकतवर प्रधानमंत्री थीं. महिला नेताओं को आमतौर पर संयमी, अपराध-विरोधी और भ्रष्टाचार-विरोधी माना जाता है.

लेकिन पंचायत के निचले स्तर के पदाधिकारियों ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया; अनेक स्थानों पर ‘पंच-पति’ ही सारे अधिकार नियंत्रित करते थे और निर्णय लेने के साथ-साथ अकूत धन कमाते थे. इस पृष्ठभूमि में और राजनीतिक व्यवस्था में बढ़ते भ्रष्टाचार के दौर में, केवल आशा ही की जा सकती है कि राजनैतिक समानता का यह अधिनियम भारतीय राजनीति की व्यवस्था को त्रस्त करने वाली विभिन्न बुराइयों पर अंकुश लगा पाएगा.  

Web Title: Nari Shakti Vandan Adhiniyam Can women bring about reforms in politics blog Abhilash Khandekar

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