बात हमारी नजरों से ओझल जंग की!, दुनिया में कितने देशों में चल रही है?

By विकास मिश्रा | Updated: January 20, 2026 05:50 IST2026-01-20T05:50:27+5:302026-01-20T05:50:27+5:30

देखें तो इस वक्त दुनिया के करीब 92 देश विभिन्न तरह की जंगों में उलझे हुए हैं. सत्ता संघर्ष में तो कई देश विभिन्न हिस्सों में बंटे नजर आते हैं.

It's about war hidden from our eyes How many countries world are at war blog Vikas Mishra | बात हमारी नजरों से ओझल जंग की!, दुनिया में कितने देशों में चल रही है?

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Highlightsनिश्चित तौर पर सबसे बुरी हालत अफ्रीकी महाद्वीप की है. कट्टर चरमपंथियों  की उपस्थिति के बीच आतंकी समूह भी हैं.संघर्ष का सबसे ज्यादा खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ रहा है.

हम जब दुनिया में चल रही जंगों की बात करते हैं तो हमारा ध्यान खास तौर पर दो जंगों की ओर ज्यादा जाता है. एक है रूस और यूक्रेन की जंग तो दूसरी है इजराइल और हमास की जंग. मगर इस बात पर कम लोगों का ही ध्यान जाता है कि इस वक्त अफ्रीकी महाद्वीप में पचास से ज्यादा जंगें चल रही हैं. दुनिया में चल रही जंगों का यह चालीस से पचास फीसदी है. इन जंगों की चर्चा करते हुए सबसे पहले तो मन में यही सवाल आता है कि दुनिया में कितने देशों में जंग चल रही है? जब जंग की बात करते हैं तो उनमें दो देशों की लड़ाई से लेकर देश के भीतर सत्ता पर कब्जे के लिए लड़ी जाने वाली सशस्त्र लड़ाइयां भी शामिल की जाती हैं. इस पैमाने पर देखें तो इस वक्त दुनिया के करीब 92 देश विभिन्न तरह की जंगों में उलझे हुए हैं. सत्ता संघर्ष में तो कई देश विभिन्न हिस्सों में बंटे नजर आते हैं.

निश्चित तौर पर सबसे बुरी हालत अफ्रीकी महाद्वीप की है. वहां सैन्य शासकों की तानाशाही भी है, धार्मिक रूप से कट्टर चरमपंथियों  की उपस्थिति के बीच आतंकी समूह भी हैं और औपनिवेशिक सोच वाले देशों का हस्तक्षेप भी है. इन सारी परिस्थितियों ने अफ्रीका के पूरे भू-भाग को भीषण संघर्ष का स्थान बना दिया है. इस संघर्ष का सबसे ज्यादा खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ रहा है.

आप यह आंकड़ा पढ़ कर हैरान रह जाएंगे कि इन जंगों के कारण अब तक करीब चार करोड़ लोग बेघर हो चुके हैं. अकेले सूडान में ही एक करोड़ 20 लाख से ज्यादा लोग बेघर हुए हैं. ये वो आंकड़े हैं जो समय-समय पर रेड क्राॅस ने जारी किए हैं. उन लोगों की तो बात ही नहीं होती जो इन जंगों में मारे गए. मारे गए लोगों की संख्या लाखों में है.

इनका आंकड़ा एकत्रित कर पाना शायद रेड क्राॅस के लिए संभव नहीं है क्योंकि ऐसे दूर-दराज क्षेत्रों में जंग हो रही है जहां शांति सेनाएं भी नहीं पहुंच पाती हैं. वैसे कत्लेआम तो करीब-करीब पूरे अफ्रीकी महाद्वीप में ही फैला है लेकिन मुख्य रूप से डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, सूडान, इथियोपिया और साहेल क्षेत्र यानी माली, बुर्किना फासो, नाइजर प्रमुख हैं.

सूडान में दो सैन्य गुट लड़ रहे हैं, इधर साहेल क्षेत्र में जिहादी समूहों के हमले ज्यादा हो रहे हैं. कभी यहां फ्रांस का प्रभाव बहुत ज्यादा था और उसका हस्तक्षेप भी था लेकिन मौजूदा हालात में फ्रांस वहां से बाहर हो चुका है. सोमालिया में आतंकी समूह  अल-शबाब ने कत्लेआम मचा रखा है तो खूंखार आतंकी संगठन बोको हराम नाइजीरिया से लेकर कैमरून, चाड, नाइजर और माली के पड़ोसी क्षेत्रों तक में आतंक मचाए हुए है. इस संगठन को इस्लामिक स्टेट्स ऑफ वेस्ट अफ्रीका प्रोविंस भी कहा जाता है.

इसका मकसद है पूरे क्षेत्र का इस्लामीकरण. बोको हराम कितना खूंखार संगठन है, आप इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि कुछ साल पहले एक स्कूल से इसने 200 लड़कियों को अगवा कर लिया था. दुनिया मिन्नतें करती रही लेकिन इसने लड़कियों को नहीं छोड़ा और वे आतंकियों को हवस बुझाने के लिए बांट दी गईं.

कुछ लड़कियां वहां से किसी तरह निकलने में कामयाब हुई थीं और उन्होंने जो किस्सा सुनाया, उससे रोंगटे खड़े हो गए लेकिन दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ा! सबसे बड़ा सवाल है कि इन आतंकी समूहों के पास हथियार और गोला बारूद कहां से आता है? जातीय समूहों या आतंकी संगठनों की कौन वित्तीय मदद करता है क्योंकि बिना बाहर से पैसे मिले इस तरह का आतंकवाद संभव ही नहीं है.

और यह देखने में भी आ रहा है कि वहां भाड़े के सैनिकों ने कई जंगें लड़ी हैं और आज भी यही हो रहा है. आपको वैगनर ग्रुप याद होगा. इसे रूस ने खड़ा किया था ताकि अमेरिकी समर्थन वाली ताकतों को कमजोर किया जा सके. वैगनर ग्रुप  रूस के भाड़े के सैनिकों का संगठन रहा है जिसकी स्थापना येवगेनी प्रिगोझिन ने की थी.

यह किसी से छिपा नहीं है कि इस संगठन का काम रूस के विरोधियों को ठिकाने लगाना था. हालांकि येवगेनी प्रिगोझिन का मतभेद रूसी रक्षा मंत्रालय के साथ हो गया था और अगस्त 2023 में एक विमान दुर्घटना में उसकी मौत हो गई. आज तक पता नहीं चला कि दुर्घटना कैसे हुई! अब जरा गौर करिए कि अफ्रीकी महाद्वीप में ये जो जंंगें चल रही हैं,

वो क्या केवल जातीय संघर्ष है या फिर सैन्य तानाशाहों के आपसी टकराव हैं? आप गहराई से जांच-पड़ताल करें तो यह समझते देर नहीं लगती है कि ये सारी लड़ाइयां अफ्रीका के संसाधनों पर कब्जे के लिए हैं. इस महाद्वीप में इतना खजाना छिपा हुआ है कि इसका समुचित तरीके से दोहन हो तो न केवल अफ्रीका बल्कि पूरी दुनिया की किस्मत चमक उठेगी.

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया का करीब 30 प्रतिशत खनिज भंडार, 12 प्रतिशत तेल और 8  प्रतिशत प्राकृतिक गैस अफ्रीका में है. इस महाद्वीप में दुनिया का 40 प्रतिशत सोना और 90 प्रतिशत क्रोमियम व प्लैटिनम के साथ भारी मात्रा में दूसरे जरूरी खनिज भी उपलब्ध हैं. कोबाल्ट का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा केवल कांगो से आता है.

ये सारी चीजें आधुनिक विज्ञान की जरूरतें हैं. एक अनुमान है कि अफ्रीका के 54 देशों में से 22 के पास खनिजों का अकूत भंडार है. घाना अफ्रीका में सोने का सबसे बड़ा उत्पादक देश है. कांगो अफ्रीका का सबसे बड़ा औद्योगिक हीरा उत्पादक है.

यही कारण है कि चीन और रूस ने बड़ी तेजी और बड़ी चालाकी से अफ्रीका में खुद का विस्तार किया. इसे अमेरिका कैसे बर्दाश्त कर सकता है? बात साफ है कि जब तक बड़ी ताकतें अफ्रीकी महाद्वीप के खनिज संसाधनों पर कब्जे की होड़ में लगी रहेंगी तब तक ये जंगें चलती रहेंगी. लोग बेघर होते रहेंगे, मरते रहेंगे और दुनिया चुपचाप देखती रहेगी.

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