सवाल है ईरान की जनता क्या चाहती है?

By विकास मिश्रा | Updated: April 28, 2026 05:18 IST2026-04-28T05:18:04+5:302026-04-28T05:18:04+5:30

मोजतबा खामनेई को मारने के लिए लालायित इजराइली खुफिया एजेंसी मोसाद या अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए को उनका कोई सुराग नहीं मिल पा रहा है.

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Highlightsघटनाओं का यदि विश्लेषण करें तो कई संकेत उभर कर सामने आते हैं.अंदाजा यह भी लगाया जा रहा है कि वे इस वक्त रूस में हो सकते हैं.सवाल को सुलझाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कई चालें चलीं.

दुनिया इस बात में उलझी हुई है कि अमेरिका और ईरान के बीच कब बात होगी? ...और क्या बातचीत वाकई होगी? नतीजे क्या निकलेंगे? मगर इस बीच दो घटनाएं ऐसी हुई हैं जिस पर चर्चा कम ही हो पाई है. पहली घटना है इसी महीने की 21 तारीख को ईरानी अवाम के मोबाइल पर सर्वोच्च नेता मोजतबा खामनेई के नाम से आया एक संदेश कि ईरान में कट्टरपंथी या उदारवादी जैसी कोई चीज नहीं है. यहां केवल एक राष्ट्र है, एक ही मार्ग है. इस संदेश से पहले तेहरान की सड़कों पर लाखों लोगों ने अमेरिका के खिलाफ प्रदर्शन किया. इन दोनों घटनाओं का यदि विश्लेषण करें तो कई संकेत उभर कर सामने आते हैं.

सबसे पहले चर्चा करते हैं मोजतबा खामनेई के संदेश की जिसे राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के साथ ही अन्य नेताओं ने भी शेयर किया. यहां सवाल यह है कि मोजतबा कहां हैं? होर्मुज  को बंद करने वाला संदेश भी उन्होंने सामने आकर नहीं दिया था बल्कि उनका लिखित संदेश पढ़ा गया था. कहा जा रहा है कि वे जिंदा तो हैं लेकिन इस कदर घायल हुए हैं कि बोल नहीं पा रहे हैं.

सवाल यह भी है कि वे यदि इशारों में या लिखित रूप से बात करने की स्थिति में हैं तो किससे संपर्क में हैं. क्या राष्ट्रपति पेजेश्कियान के साथ या अपने सबसे वफादार अहमद वाहिदी के नेतृत्व वाले इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड (आईआरजीसी) के संपर्क में हैं? मगर ऐसे किसी संपर्क के कहीं संकेत नहीं मिल रहे हैं.

अंदाजा यह भी लगाया जा रहा है कि वे इस वक्त रूस में हो सकते हैं. सवाल किया जा सकता है कि क्या ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के मास्को दौरे से इस बात का कोई रिश्ता है? कुछ भी कहना मुश्किल है. हां ये बात जरूर है कि मोजतबा खामनेई को मारने के लिए लालायित इजराइली खुफिया एजेंसी मोसाद या अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए को उनका कोई सुराग नहीं मिल पा रहा है.

ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि मोजतबा की अनुपस्थिति में ईरान की सत्ता किसके हाथ में है? इसका जवाब न अमेरिका को मिल रहा है और न ही इजराइल को! कोई तो ऐसा सिस्टम हैै जिसने सबको एक सूत्र में पिरो रखा है. तो क्या मोजतबा ही वो शख्स हैं जो पर्दे के पीछे से सूत्र संभाल रहे हैं? इस सवाल को सुलझाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कई चालें चलीं.

मसलन उन्होंने कहा कि जो ईरानी नेता अभी सत्ता में हैं, वे अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में उदार हैं. हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि वे किस नेता की बात कर रहे हैं? ऐसा दिखता है कि राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के नेतृत्व में विदेश मंत्री अब्बास अराघची अमेरिका के साथ बातचीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं लेकिन प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ कर रहे हैं.

यानी तीनों ही अधिकार संपन्न नहीं दिख रहे हैं. अब ट्रम्प ने नया शगूफा छोड़ा है कि ईरान ने बातचीत को लेकर नया ऑफर दिया है. मगर यह नहीं बताया कि ऑफर क्या है? कुल मिलाकर ट्रम्प का हर बयान निरर्थक साबित हो रहा है. गुत्थी सुलझ ही नहीं रही है कि मोजतबा वास्तव में हैं कहां? अब मोजतबा के नाम से ईरान के लोगों के मोबाइल पर पहुंचे संदेश के मायने को समझिए! लोकतंत्र और मानवाधिकार की बहाली को लेकर कई दशकों से ईरान में प्रबल आंदोलन होते रहे हैं.

वहां का कट्टर प्रशासन बंदूक की नोंक पर ऐसे आंदोलनों को कुचलता रहा है. ट्रम्प को भरोसा था कि ईरान पर हमले और शीर्ष नेतृत्व के खात्मे की स्थिति में ईरानी जनता कट्टरपंथी सरकार को उखाड़ फेंकेगी. मगर ऐसा हुआ नहीं! बल्कि अमेरिकी-इजराइली बमों और मिसाइलों से जब आम लोग मारे जाने लगे, खासकर बच्चों की मौत के बाद मुल्क में काफी हद तक अमेरिका विरोधी माहौल बन गया!

ट्रम्प ने जब धमकी दी कि एक रात में पूरी ईरानी सभ्यता को समाप्त कर देंगे तो यह बात ईरानियों के दिल पर जाकर लगी. एक कहावत है कि लोग अपने घरों में लड़ लेते हैं लेकिन जब बाहर का हमलावर सामने आता है तो घर के सारे लोग एकजुट हो जाते हैं. कट्टरपंथी सरकार ने इस स्थिति का फायदा उठाया और बड़ी बेरहमी से लोकतंत्र समर्थकों को कुचल डाला.

कइयों को फांसी दे दी गई. जो लोग सरकार समर्थक थे, वे और भी ज्यादा उग्र हो गए. ईरान में राष्ट्रवाद की नई लहर पैदा हो गई. जो ट्रम्प ने सोचा था, उसका ठीक उल्टा हो गया! यानी देश को एकजुट रखने के उद्देश्य से ही ईरान के सर्वोच्च नेता ने यह संदेश जारी किया कि यहां कट्टरपंथी और उदारवादी जैसी कोई चीज है ही नहीं.

तो क्या यह माना जाए कि हालात सुधरने के बाद ईरानी सरकार के रवैये में कोई फर्क आएगा? क्या मानव अधिकारों को वाकई तवज्जो दी जाएगी? इस संबंध में कुछ भी कहना अभी संभव नहीं है. अभी तो यही पता नहीं है कि आगे होगा क्या? मगर एक बात तय है कि ईरान किसी भी सूरत में अमेरिका के सामने सरेंडर नहीं करने वाला है.

21 अप्रैल की देर रात तेहरान की सड़कों पर जो नजरा दिख रहा था, वह दुश्मन की रूह कंपा देने वाला था. तेहरान की सड़कों पर लाखों लोग जमा थे. उनके हाथों में आधुनिक राइफलें तो थीं ही, रिवोल्यूशनरी गार्ड के कमांडर भी मिसाइल लॉन्चरों के साथ प्रदर्शन में शामिल थे. निश्चय ही इस तरह का प्रदर्शन स्वत:स्फूर्त नहीं रहा होगा.

सरकार ने ही इसे आयोजित किया होगा लेकिन संकेत साफ है कि दुश्मनों के दांत खट्टे करने के लिए ईरान कमर कस चुका है. यह इस बात का भी संकेत है कि भले ही ईरानी मिसाइल अमेरिका तक न पहुंच पाए लेकिन अमेरिकी युद्धपोतों के साथ ही मध्य पूर्व के देशों को तो तबाह किया ही जा सकता है. सीजफायर के पहले ईरान ने अपनी ताकत दिखा भी दी थी.

इस तरह से सड़कों पर मिसाइलों का प्रदर्शन करके ईरान मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालने की कोशिश भी कर रहा है. मगर सबसे बड़ी हकीकत यह है कि ईरान का आम आदमी क्या चाहता है, यह किसी को पता नहीं! उसके लिए तो उसकी कट्टरपंथी सरकार भी उसकी दुश्मन है जो हर आवाज को मौत के घाट उतार देती है. और अमेरिकी या इजाइली मिसाइलों ने भी कहां देखा कि मरने वाला कट्टरवादी था या उदारवादी?  ईरान हो या यूक्रेन, हर जगह आम आदमी ही मरता है

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