साइबर ठगी के मामलों में ग्राहक को नहीं ठहरा सकते जिम्मेदार 

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: April 20, 2026 07:12 IST2026-04-20T07:11:31+5:302026-04-20T07:12:04+5:30

दिल्ली हाईकोर्ट ने हरिराम सिंह बनाम रिजर्व बैंक और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (18 नवंबर, 2024) के केस में फिशिंग (वॉयस फिशिंग) के जरिये हुए साइबर फ्रॉड में उपभोक्ता को पूरी रकम नौ प्रतिशत ब्याज और 25000 रुपए खर्च के साथ देने का आदेश दिया था.

Customers cannot be held responsible for cyber fraud | साइबर ठगी के मामलों में ग्राहक को नहीं ठहरा सकते जिम्मेदार 

साइबर ठगी के मामलों में ग्राहक को नहीं ठहरा सकते जिम्मेदार 

डॉ. खुशालचंद बाहेती

डिजिटल बैंकिंग ने हालांकि ट्रांजैक्शन को आसान बना दिया है, लेकिन साइबर फ्रॉड एक गंभीर चुनौती बनकर उभरा है. इस पृष्ठभूमि में, रिजर्व बैंक की बनाई ‘जीरो लायबिलिटी’ सोच कस्टमर प्रोटेक्शन की रीढ़ बन रही है. 6 जुलाई, 2017 के एक सर्कुलर के जरिये, रिजर्व बैंक ने साफ किया कि अगर ग्राहक तीन वर्किंग डेज के अंदर बैंक को फ्रॉड की जानकारी देता है और कस्टमर की तरफ से कोई गंभीर लापरवाही (जैसे ओटीपी/पासवर्ड शेयर करना वगैरह) साबित नहीं होती है, तो ग्राहक को कोई नुकसान नहीं उठाना पड़ता है.

हालांकि, बैंक बस ग्राहक को दोषी मानकर बचने की कोशिश करते हैं. इस मामले में, सुबोध चंद्रकांत कोर्डे बनाम केंद्र सरकार में बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला खास तौर पर अहम है. जुलाई 2021 में, कोर्डे के अकाउंट से सिर्फ 41 मिनट में बिना इजाजत के 38.04 लाख रुपए निकाल लिए गए थे. खास बात यह है कि बैंक ने बेनिफिशियरी जोड़ने और ट्रांजैक्शन अमाउंट लिमिट बढ़ाने जैसे सेंसिटिव बदलावों के बारे में असरदार अलर्ट या सुरक्षा जांच नहीं की. जैसे ही इस घटना का पता चला, ग्राहक ने तुरंत बैंक को बताया और केस दर्ज कराया.

उसने रिजर्व बैंक और बैंकिंग अधिकारी से भी संपर्क किया. हालांकि, बैंक ने यह कहते हुए जिम्मेदारी से इनकार कर दिया कि ट्रांजैक्शन ‘ओटीपी’ पर आधारित था. सिम कार्ड खराब होने की बात कहते हुए नकली कागजात जमा करके पुणे, नासिक और ठाणे से चार दिन में चार बार नए सिम कार्ड लिए गए.

ओटीपी नए सिम कार्ड पर आया. बताया गया कि शिकायत करने वाले की तरफ से कोई लापरवाही नहीं हुई. हाईकोर्ट ने बैंक का पक्ष खारिज कर दिया और कहा कि ‘ओटीपी’ का मुद्दा निर्णायक नहीं हो सकता, साइबर फ्रॉड एक बहुत एडवांस्ड तरीका है. रिजर्व बैंक के 2017 के सर्कुलर के आधार पर कोर्ट ने बैंक को 38.04 लाख रुपए ब्याज के साथ वापस करने का आदेश देते हुए कहा कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि उपभोक्ता ने जानबूझकर संवेदनशील जानकारी साझा की थी, और बैंक के सुरक्षा तंत्र में खामियां थीं.

इससे पहले, दिल्ली हाईकोर्ट ने विशाल गुप्ता बनाम आईसीआईसीआई बैंक मामले में कहा था कि फिशिंग या ऑनलाइन फ्रॉड के मामले में पूरी जिम्मेदारी ग्राहक पर डालना सही नहीं है, खासकर तब जब बैंक के सुरक्षा तंत्र में कमियां हों. 2024 में, बॉम्बे हाईकोर्ट ने जयप्रकाश कुलकर्णी बनाम बैंकिंग ओम्बड्समैन और बैंक ऑफ बड़ौदा मामले में बैंक को 76.90 लाख रुपए वापस करने का निर्देश देते हुए कहा था कि ग्राहक को दोषी ठहराने के बैंक को सबूत देने होंगे. दिल्ली हाईकोर्ट ने हरिराम सिंह बनाम रिजर्व बैंक और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (18 नवंबर, 2024) के केस में फिशिंग (वॉयस फिशिंग) के जरिये हुए साइबर फ्रॉड में उपभोक्ता को पूरी रकम नौ प्रतिशत ब्याज और 25000 रुपए खर्च के साथ देने का आदेश दिया था.

राजस्थान हाईकोर्ट (मई 2025) ने कहा है कि अगर ‘सिम कॉम्प्रोमाइज’ होता है, तो तीन दिन के अंदर शिकायत दर्ज कराने पर जीरो लायबिलिटी होती है. इलाहाबाद हाईकोर्ट (2025) ने अपने फैसले में साफ किया है कि ग्राहक को दोषी ठहराने के लिए बैंक को सबूत देना होगा.

इन फैसलों के अध्ययन से यह साफ होता है कि अदालत अब ग्राहक की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही हैं. जीरो लायबिलिटी केवल एक मार्गदर्शक तत्व नहीं है, बल्कि यह न्यायिक तौर पर लागू करने लायक हक बनता जा रहा है. बैंकों को भी अपना दृष्टिकोण बदलने की जरूरत है. आखिरकार, अगर डिजिटल इकोनॉमी में भरोसा बनाए रखना है, तो जीरो लायबिलिटी के सिद्धांत पर सख्ती से अमल करना जरूरी है.

Web Title: Customers cannot be held responsible for cyber fraud

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