एहसान नहीं, महिलाओं का ये हक है!
By विजय दर्डा | Updated: April 20, 2026 06:12 IST2026-04-20T06:12:04+5:302026-04-20T06:12:04+5:30
2023 में संसद ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित कर दिया. मांग उठी थी कि वर्ष 2024 में ही आरक्षण लागू कर दिया जाए लेकिन शायद वो संभव नहीं था. सरकार इसे 2029 में लागू करने पर अडिग थी लेकिन अब अड़ंगा लग गया है.

एहसान नहीं, महिलाओं का ये हक है!
इस वक्त सबसे ज्यादा चर्चा का विषय है लोकसभा और विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण. यह विधेयक 2023 में पारित हो चुका है और पिछले सप्ताह सरकार ने इसे लागू करने की अधिसूचना भी जारी कर दी है. इसमें संशोधन के लिए नया बिल लाया गया था लेकिन वह पारित नहीं हो पाया. मेरा मानना है कि आरक्षण कोई एहसान नहीं है बल्कि महिलाओं का हक है.
अब सवाल है कि आगे क्या होगा? सरकार कह रही है कि लोकसभा के लिए यह कानून 2029 में लागू हो जाएगा. अब चूंकि विपक्ष ने इसे परिसीमन से जोड़ कर देखा इसलिए हमलावर होना लाजमी था. विपक्ष का कहना है कि लोकसभा सीटों की संख्या 850 होने के बाद इसे लागू करने के बजाय मौजूदा संख्या पर ही लागू किया जाए. परिसीमन को लेकर विपक्ष की कई आशंकाएं हैं. मैं उन आशंकाओं को लेकर यहां बात नहीं करूंगा. मैं महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण की बात करूंगा. आरक्षण जितनी जल्दी लागू हो, उतना ही बेहतर होगा क्योंकि बहुत सारा वक्त हम खो चुके हैं. हमें इस बात पर गौर करना चाहिए कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के बावजूद महिलाओं की हिस्सेदारी के मामले में हम पीछे रहे हैं. संसदीय लोकतंत्र में महिलाओं की वैश्विक भागीदारी करीब 20 प्रतिशत रही है जबकि हमारा अधिकतम आंकड़ा भी कभी 14 प्रतिशत के पार नहीं जा पाया है. आधी आबादी को राजनीति में केवल एक तिहाई हिस्सा मिलने में आखिर इतना वक्त क्यों लग गया?
इस पर चर्चा से पहले चलिए जरा लोकसभा के प्रथम चुनाव को याद कर लेते हैं. पहला चुनाव 1951-1952 में हुआ. उसके लिए मतदाताओं का जो सर्वेक्षण हुआ उसमें 28 लाख महिलाओं ने अपना नाम लिखवाने के बजाय यह लिखवाया कि वो अमुक व्यक्ति की बीवी हैं या फिर अमुक व्यक्ति की मां हैं या बहन हैं. उस जमाने में देश के कई हिस्सों में यही प्रचलन था. महिलाओं को उनके नाम से नहीं बल्कि रिश्तों से पहचान मिलती थी. प्रथम मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन इतने खफा हुए कि उन्होंने ऐसे 28 लाख नामों को सूची से बाहर करने का फैसला किया. वो क्रांतिकारी कदम था. समाज को लगा कि महिलाओं का हक मारा गया है और अगले चुनाव में ऐसी महिलाओं ने आगे बढ़ कर नाम दर्ज कराए.
ये कहानी मैं इसलिए सुना रहा हूं ताकि आपको यह अंदाजा हो सके कि भारतीय महिलाओं ने राजनीतिक व्यवस्था की पगडंडी से शुरुआत करते हुए पक्की सड़क और आज हाइवे तक का सफर पूरा किया है. दिलचस्प बात यह है कि लोकसभा के उस पहले चुनाव में भी 489 सदस्यों में 22 महिलाएं जीत कर आईं थी जो कुल संख्या का केवल 4.4 प्रतिशत थीं. उसके बाद के आंकड़े देखिए... महिलाओं की संख्या दूसरी लोकसभा में 5.4 प्रतिशत, तीसरी में 6.7 प्रतिशत, चौथी में 5.9 प्रतिशत, पांचवीं में 4.2 प्रतिशत, छठी में 3.4 प्रतिशत, सातवीं में 5.1 प्रतिशत, आठवीं में 8.11 प्रतिशत, नौवीं में 5.3 प्रतिशत, दसवीं में 7 प्रतिशत, ग्यारहवीं में 7.4 प्रतिशत, बारहवीं में 8 प्रतिशत, तेरहवीं लोकसभा में 8.8 प्रतिशत तथा चौदहवीं लोकसभा में 8.1 प्रतिशत ही थी. पहली बार पंद्रहवीं लोकसभा में 10.9 प्रतिशत महिलाएं चुनकर आईं. उसके बाद आंकड़े बढ़े. सोलहवीं लोकसभा में आंकड़ा 11 प्रतिशत तक पहुंचा. सत्रहवीं और अठारहवीं लोकसभा का आंकड़ा 14 प्रतिशत के आसपास रहा. ये आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं की भागीदारी की रफ्तार अत्यंत धीमी रही है.
वैसे भागीदारी बढ़ाने की कोशिश बहुत लोगों ने की. राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे तब उनकी बनाई एक कमेटी ने शासन में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का सुझाव दिया था. इसी सुझाव के मद्देनजर पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार ने पंचायतों में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिया. उसके बाद विधानसभा और लोकसभा के लिए भी ऐसी मांग उठी. सितंबर 1996 में पहली बार एच.डी. देवेगौड़ा की सरकार ने लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पेश किया लेकिन बात बनी नहीं. उस बिल को संयुक्त संसदीय समिति को भेज दिया गया. दरअसल एक बड़ा वर्ग ऐसा था जो महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण के पक्ष में ही नहीं था. 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे, तब भी महिला आरक्षण बिल पास कराने की कोशिश हुई. उस वक्त आरजेडी के सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव ने लालकृष्ण आडवाणी के हाथ से बिल की प्रति छीन कर फाड़ दी थी. मैं उस समय सदन में था और अटल जी ने चुटकी लेते हुए कहा था कि लालू जी ने पत्नी को मुख्यमंत्री बना दिया लेकिन यहां महिलाओं को आरक्षण नहीं देना चाहते हैं.
दरअसल लालू प्रसाद यादव की आरजेडी और मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी ने हर वक्त महिला आरक्षण बिल का विरोध किया. जून 2009 में मनमोहन सिंह की सरकार ने महिला आरक्षण बिल को राज्यसभा में पास करा लिया लेकिन आरजेडी और सपा के भीषण विरोध के कारण लोकसभा में पास नहीं हो सका. मगर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सोच को अमली जामा पहनाने वाले अमित शाह की खासियत है कि तय कर लिया तो उसे अंजाम तक हर हाल में पहुंचाएंगे. 2023 में संसद ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित कर दिया. मांग उठी थी कि वर्ष 2024 में ही आरक्षण लागू कर दिया जाए लेकिन शायद वो संभव नहीं था. सरकार इसे 2029 में लागू करने पर अडिग थी लेकिन अब अड़ंगा लग गया है.
मुझे पूरा भरोसा है कि हमारी महिलाएं राजनीति की धारा को पवित्रता की राह पर आगे ले जाएंगी. हमारी बेटियों ने धरती से लेकर नील गगन तक को अपनी प्रतिभा से आलोकित किया है. राजनीति भी उनकी प्रतिभा से आलोकित हो, यही कामना है मगर अड़ंगे बहुत हैं. आगे-आगे देखिए, होता है क्या? बस एक बात समझ में नहीं आती कि जब सभी दल महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बात करते हैं तो फिर यह लागू क्यों नहीं हो रहा है? सभी राजनीतिक दलों की कथनी और करनी में बहुत अंतर है. जब उनसे पूछो कि महिलाओं को ज्यादा संख्या में टिकट क्यों नहीं देते तो जवाब होता है कि वे जीत नहीं पातीं. दरअसल पुरुषवादी मानसिकता से हमारी राजनीति भी बाहर नहीं आ पा रही है.