संविधान की रक्षा में अधिवक्ताओं की भूमिका
By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: May 13, 2026 05:35 IST2026-05-13T05:35:28+5:302026-05-13T05:35:28+5:30
महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और डॉ. बी. आर. आंबेडकर जैसे अनेक प्रमुख नेता वकालत के पेशे से जुड़े थे.

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न्यायमूर्ति बीआर गवई
श्रीलंका बार एसोसिएशन की यात्रा प्रेरणादायक रही है. अनेक मायनों में इसकी कहानी, श्रीलंका में विधि व्यवसाय की अंतरात्मा की कहानी भी है. किसी संस्था का महत्व केवल उसकी स्थापना की तिथि या उसके लंबे अस्तित्व से नहीं, बल्कि उन मूल्यों से तय होता है जिनकी रक्षा वह पीढ़ी दर पीढ़ी करती रहती है. मैं अपनी एक दृढ़ मान्यता आपके साथ साझा करना चाहता हूं. संवैधानिक लोकतंत्र में बार और न्यायपालिका दो अलग-अलग या एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी संस्थान नहीं हैं. वे एक-दूसरे के पूरक हैं.
लोकतंत्र के सुचारू संचालन के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका की आवश्यकता पर बहुत चर्चा होती है और इसमें कोई संदेह भी नहीं है. संविधान की अंतिम व्याख्या करने का अधिकार न्यायालयों के पास होता है. लेकिन न्यायपालिका की स्वतंत्रता अकेले कायम नहीं रह सकती. उसे मजबूती भी एक स्वतंत्र बार से मिलती है और उसकी वास्तविक परीक्षा भी उसी के माध्यम से होती है.
अब मैं भारत के कुछ अनुभव आपके साथ साझा करना चाहूंगा. मेरे देश में औपनिवेशिक शासन के खिलाफ चला स्वतंत्रता आंदोलन काफी हद तक उन लोगों के नेतृत्व में आगे बढ़ा, जिन्होंने कानून की शिक्षा प्राप्त की थी. महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और डॉ. बी. आर. आंबेडकर जैसे अनेक प्रमुख नेता वकालत के पेशे से जुड़े थे.
यह बात कानून, राजनीति और सामाजिक परिवर्तन के बीच गहरे संबंध को भी सामने लाती है. महात्मा गांधी का उदाहरण ही ले लीजिए. उन्होंने विधि की शिक्षा जरूर प्राप्त की थी, लेकिन उनका योगदान अदालतों तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने सविनय अवज्ञा की अवधारणा को केवल कानून तोड़ने के रूप में नहीं, बल्कि अन्यायपूर्ण कानूनों के खिलाफ एक नैतिक प्रतिरोध के रूप में विकसित किया.
उनके इस तरीके ने विरोध और संघर्ष की पूरी भाषा को ही नया स्वरूप दे दिया. इसी तरह डॉ. आंबेडकर ने भी कानून को संवैधानिक निर्माण और सामाजिक बदलाव के एक प्रभावी माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया. भारतीय संविधान के निर्माण में उनकी भूमिका सर्वविदित है, लेकिन कानून के साथ उनका जुड़ाव केवल संविधान-निर्माण तक सीमित नहीं था.
1927 के महाड सत्याग्रह जैसे आंदोलनों के माध्यम से उन्होंने समाज में गहराई तक जड़ जमा चुकी ऊंच-नीच की व्यवस्था को चुनौती दी. यह संघर्ष केवल सार्वजनिक जलस्रोत तक पहुंच पाने का प्रश्न नहीं था, बल्कि सम्मान, समानता और समाज में बराबरी के अधिकार के लिए लड़ी गई लड़ाई थी.
ये उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि अधिवक्ताओं और एक स्वतंत्र बार की भूमिका केवल अदालतों में मुकदमे लड़ने तक सीमित नहीं होती. अधिवक्ता समाज की नैतिक और राजनीतिक सोच को दिशा देते हैं. भारतीय संविधान लागू होने के बाद अधिवक्ताओं की भूमिका एक नए और अत्यंत महत्वपूर्ण रूप में सामने आई.
संविधान को केवल लिखित दस्तावेज के रूप में नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन में लागू होने वाले सिद्धांतों के रूप में समझना और स्थापित करना आवश्यक था. यह काम अदालतों में आने वाले मामलों के माध्यम से हुआ और इस दौर में बार के सदस्यों ने भारतीय संवैधानिक व्यवस्था को आकार देने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण नानी पालखीवाला हैं. उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में अपने प्रभावशाली तर्कों के माध्यम से यह स्थापित करने का प्रयास किया कि संसद की संविधान संशोधन की शक्ति असीमित नहीं हो सकती. उनका कहना था कि संविधान की कुछ मूल विशेषताएं ऐसी हैं, जिन्हें संशोधन के माध्यम से भी समाप्त नहीं किया जा सकता.
आगे चलकर यही तर्क 1973 में आए ऐतिहासिक फैसले केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य में निर्णायक रूप से सामने आए, जहां सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया. न्यायालय ने कहा कि संसद को संविधान संशोधन के व्यापक अधिकार अवश्य प्राप्त हैं, लेकिन वह संविधान के मूल ढांचे को नहीं बदल सकती.
1975 में आपातकाल घोषित हुआ. इस के दौरान एक और महत्वपूर्ण मोड़ आया. एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि आपातकाल के समय व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अदालत जाने के अधिकार को स्थगित किया जा सकता है. इस फैसले में एकमात्र असहमति न्यायमूर्ति एच. आर. खन्ना की थी.
उनका स्पष्ट मत था कि आपातकाल के दौरान भी राज्य किसी व्यक्ति को कानून के अधिकार के बिना उसके जीवन और स्वतंत्रता से वंचित नहीं कर सकता. न्यायमूर्ति खन्ना यह अच्छी तरह जानते थे कि उन्हें अपनी इस असहमति की संस्थागत कीमत चुकानी पड़ सकती है. उनके असहमति वाले निर्णय के बाद उन्हें भारत के मुख्य न्यायाधीश पद के लिए नजरअंदाज कर दिया गया.
लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह भी उतना ही महत्वपूर्ण था. बार ने चुप्पी नहीं साधी. सर्वोच्च न्यायालय बार एसोसिएशन और देशभर की विभिन्न बार एसोसिएशनों ने इस निर्णय का विरोध किया और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के सिद्धांत के समर्थन में मजबूती से खड़े रहे. एक स्वतंत्र बार न्यायिक जवाबदेही को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं हो सकता कि वह किसी भी प्रकार की समीक्षा या सवालों से परे हो जाए. अदालतों के साथ अपने नियमित जुड़ाव के कारण बार के सदस्य अक्सर सबसे पहले उन स्थितियों को पहचानते हैं, जहां संस्थागत मर्यादाओं या स्थापित मानकों से विचलन दिखाई देता है.
ऐसे समय में यदि आवश्यकता हो तो न्यायाधीशों के अनुचित आचरण के खिलाफ आवाज उठाकर बार संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर नहीं, बल्कि और अधिक मजबूत करता है. भारत में वकीलों ने जनहित याचिकाओं के माध्यम से भी नागरिक अधिकारों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
1980 के दशक से सर्वोच्च न्यायालय ने पारंपरिक प्रक्रिया संबंधी नियमों में कुछ लचीलापन अपनाया, जिससे वकीलों और जागरूक नागरिकों को वंचित और हाशिए पर खड़े समुदायों की ओर से अदालतों का दरवाजा खटखटाने की अनुमति मिली. इससे न्याय तक पहुंचने का स्वरूप ही बदल गया.
एम. सी. मेहता ने प्रदूषण और औद्योगिक खतरों से जुड़े मामलों को अदालत के समक्ष रखकर पर्यावरण कानून के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाई. वहीं डी. के. बसु द्वारा शुरू की गई कार्यवाही के परिणामस्वरूप गिरफ्तारी और हिरासत से संबंधित महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय तय किए गए.
ये उदाहरण दिखाते हैं कि अधिवक्ताओं ने केवल अधिकारों के उल्लंघन पर प्रतिक्रिया ही नहीं दी, बल्कि संवैधानिक अधिकारों की दिशा और स्वरूप तय करने में भी सक्रिय भूमिका निभाई. अंत में मैं यही कहना चाहूंगा कि भारत और श्रीलंका, दोनों का अनुभव हमें यह बताता है कि संवैधानिक लोकतंत्र की वास्तविक ताकत केवल संविधान के लिखित प्रावधानों या संस्थागत ढांचे में नहीं होती. इसकी मजबूती एक स्वतंत्र, सजग और सक्रिय बार की भूमिका से भी तय होती है.