जब अपने दुश्मन बनते हैं तो दुश्मन से भी अधिक भयानक होते हैं!
By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: May 13, 2026 05:34 IST2026-05-13T05:34:48+5:302026-05-13T05:34:48+5:30
असम में लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने वाले हिमंत बिस्वा सरमा भी भाजपा में शामिल होने के पहले तक कांग्रेस के उन्हीं राहुल गांधी के खासमखास थे, जिन पर वे दल बदलने के बाद तीखा हमला करने लगे हैं.

सांकेतिक फोटो
हेमधर शर्मा
हाल ही में पांच राज्यों के हुए विधानसभा चुनावों की एक खासियत यह रही कि दो राज्यों के निर्वाचित होने वाले मुख्यमंत्रियों ने अपनी वर्तमान पार्टी को उसी राजनीतिक दल के खिलाफ जिताया, जिसमें वे कभी खुद शामिल थे. पश्चिम बंगाल में भाजपा के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी अभी कुछ वर्ष पहले तक ममता बनर्जी के दाहिने हाथ माने जाते थे, जिन्हें हराकर अब वे मुख्यमंत्री बने है.
इसी तरह असम में लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने वाले हिमंत बिस्वा सरमा भी भाजपा में शामिल होने के पहले तक कांग्रेस के उन्हीं राहुल गांधी के खासमखास थे, जिन पर वे दल बदलने के बाद तीखा हमला करने लगे हैं. अपनी मूल पार्टी का ही कट्टर प्रतिद्वंद्वी बन जाने के ऐसे उदाहरणों की राजनीति में भरमार है.
राजनीति ही नहीं, जीवन के प्राय: सभी क्षेत्रों में ऐसे ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे जहां कभी घुल-मिल कर रहने वाले बाद में एक-दूसरे के जानी दुश्मन बन गए. खेती या अन्य प्राॅपर्टी के विवाद में भाई द्वारा भाई की ही जान लेने या हमला करने की खबरें आए दिन पढ़ने-सुनने को मिलती हैं. मुगलकाल में तो सत्ता के लिए अपने सगे भाइयों को मौत के घाट उतारे जाने का लम्बा इतिहास मिलता है.
सिर्फ औरंगजेब ने ही नहीं अपने पिता शाहजहां को कैद कर अपने तीन भाइयों को मरवा डाला था, बल्कि शाहजहां ने भी अपने तीन भाइयों को मरवाया था. हुमायूं ने अपने भाई कामरान को अंधा करवा दिया था. मेवाड़ के महाराणा कुंभा की हत्या उनके बड़े बेटे उदय सिंह प्रथम ने कर दी थी. राजा अजीत सिंह राठौर को उनके बेटों अभय सिंह और बखत सिंह ने मार डाला था.
बौद्ध ग्रंथों के अनुसार, सम्राट अशोक ने सिंहासन पाने के लिए अपने 99 भाइयों की हत्या कर दी थी. अजातशत्रु ने सत्ता के लिए अपने पिता बिम्बिसार को मरवा दिया था और उसी अजातशत्रु को बाद में उसके बेटे उदयन ने मार डाला. यहां तक देशों का भी अगर कभी बंटवारा होता है तो वे एक-दूसरे के इतने निर्मम दुश्मन बन जाते हैं जितना बाहरी दुश्मन भी नहीं बनते.
भारत और पाकिस्तान के रिश्ते इसका ज्वलंत उदाहरण हैं. उत्तर और दक्षिण कोरिया भी एक-दूसरे को खा जाने वाली नजर से देखते हैं. जिस यूक्रेन के साथ रूस का पिछले चार वर्षों से युद्ध जारी है वह कभी रूस का ही हिस्सा था. विधर्मियों या पराई संस्कृति के लोगों पर हम मनुष्य पुराने जमाने से ही आक्रमण करते रहे हैं.
देवासुर-संग्राम या राम-रावण युद्ध जैसे संघर्ष इसके प्रमाण हैं. लेकिन पारिवारिक शत्रुता के ज्वलंत उदाहरण भी तो महाभारत के रूप में मौजूद हैं! यहां तक कि बाद में एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन बन जाने वाले सुर और असुर भी एक ही पिता (महर्षि कश्यप) की संतान थे. ऐसे इतिहास के मद्देनजर, जिन्हें हम विधर्मी या अपना विरोधी मानते हैं,
क्या गारंटी है कि उनका अगर सफाया भी हो जाए तो हम निष्कंटक या शत्रुविहीन जीवन जी सकेंगे! सच तो यह है कि हम अपने बच्चों के साथ भले ही कितना भी अच्छा व्यवहार करें लेकिन बच्चे बड़े होने पर हमारे साथ कैसा व्यवहार करेंगे, यह इस पर निर्भर करता है कि वे हमें शेष दुनिया के साथ कैसा व्यवहार करते हुए देखते हैं. यही बात हर जगह लागू होती है.
चूंकि पार्टी से अलग होने वाला उसकी सारी खूबियों-खामियों को जानता है, इसलिए दुश्मन बनने पर वह ऐसे मर्मस्थल पर प्रहार करने में सक्षम होता है जहां पुराने दुश्मन नहीं कर पाते. हिंदुस्तान के बंटवारे के समय एक-दूसरे का जितना खून हिंदू-मुसलमानों ने कुछ महीनों के भीतर ही बहा दिया, उतना शायद अंग्रेजों ने हिंदुस्तानियों का सैकड़ों सालों में भी नहीं बहाया होगा!
राम-रावण के, अर्थात मनुष्यों और राक्षसों की दो संस्कृतियों के बीच होने वाले युद्ध में पराजित होने वाले रावण के पक्ष में फिर भी बहुत सारे लोग जिंदा बच गए थे, लेकिन महाभारत के पारिवारिक युद्ध में तो पांच पांडवों को छोड़कर लगभग कोई नहीं बचा! और जिन श्रीकृष्ण के बल पर पांडवों ने अपने चचेरे भाइयों (कौरवों) पर विजय पाई, उनके अपने यादव कुल का विनाश भी क्या आपसी संघर्ष से ही नहीं हुआ!
इसलिए आज जो यह सोचते हैं कि विधर्मियों का विनाश करके वे अपने धर्म के एकछत्र राज में निश्चिंत होकर जी सकेंगे, वे शायद मूर्खों के स्वर्ग में रहते हैं. दुनिया में शायद ही कोई धर्म होगा, जिसके भीतर विभाजन न हुए हों और वे एक-दूसरे के प्रति द्वेष भाव न रखते हों.
यह सच है कि बारी जब बाहरी शत्रु से लड़ने की आती है तो वे एकजुट हो जाते हैं लेकिन बाहरी खतरे का भय छंटते ही वे अपने सहधर्मियों पर टूट पड़ते हैं. तो दुनिया में शांति से जीने का आखिर उपाय क्या है?उपाय यही है कि हम अपने दुश्मनों या विरोधियों के साथ भी सद्भाव से रहने की कोशिश करें.
हमारे दुश्मनों पर हो सकता है हमारी सद्भावना का ज्यादा असर न दिखे लेकिन हमारे बच्चों पर निश्चित रूप से उसका प्रभाव दिखेगा और अपने दुश्मनों के प्रति भलाई के बीज बोने का फल हमें अपनी भावी पीढ़ियों के बीच सद्भाव के रूप में चखने को मिलेगा.