दु:ख-दर्द को जिया और खुशियों को बांटा!
By Amitabh Shrivastava | Updated: April 18, 2026 06:12 IST2026-04-18T06:12:06+5:302026-04-18T06:12:06+5:30
हर कोई उनसे जुड़कर अपना स्नेह व्यक्त करने में जुटा है. शायद यही आशाताई की अपनी जमीं पर लिखी आसमां जितनी बुलंदियों को पाने की कहानी है.

file photo
आसमां इतनी बुलंदी पे जो इतराता है
भूल जाता है जमीं से ही नजर आता है
शायर वसीम बरेलवी का यह शेर सुप्रसिद्ध गायिका आशा भोसले के जीवन दर्शन पर खरा उतरता है, जिसने 92 साल की उम्र तक उन्हें अपनी ‘आशाताई’ बनाकर रखा. पद्म विभूषण से लेकर महाराष्ट्र भूषण तक न जाने कितने पुरस्कार, अनगिनत कार्यक्रम, हजारों फिल्मी और गैरफिल्मी गीत के बावजूद अक्सर मराठी में बातचीत करना, महाराष्ट्र की संस्कृति और साहित्य पर हमेशा ध्यान केंद्रित रखना और समसामयिक घटनाओं पर स्पष्टवादी के रूप में वेदना-संवेदना व्यक्त करना उनका स्वभाव था.
अपने जीवन में गैरमराठी ही नहीं, विदेशी कलाकारों के साथ सामंजस्य स्थापित कर उस हर ऊंचाई को छूना, जिसका हर कोई सपना देखता है, उनके असाधारण व्यक्तित्व के गुण थे. उनकी विशेषताओं की मराठी मानुस पर छाप कितनी गहरी थी, वह उनके निधन के पश्चात दिखाई दे रही है. अनेक स्थानों पर स्वप्रेरणा से उनकी स्मृति में कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है.
हर कोई उनसे जुड़कर अपना स्नेह व्यक्त करने में जुटा है. शायद यही आशाताई की अपनी जमीं पर लिखी आसमां जितनी बुलंदियों को पाने की कहानी है. करीब चार साल पहले सुर कोकिला लता मंगेशकर का निधन हुआ था, तब उनके सम्मान और पहचान को लेकर अनेक बातें सामने आई थीं. दुनिया में उनका कद इतना ऊंचा था, जहां तक पहुंचना लगभग असंभव ही माना गया.
वह महाराष्ट्र में लता दीदी के रूप में पहचान रखती थीं और अंत समय तक वह अपने बड़प्पन के लिए पहचानी गईं. मगर आशा भोसले ने अपनी उम्र के साथ बड़प्पन का तमगा नहीं लगने दिया. वह आखिरी समय में अपनी पोती जनाई की सबसे करीबी थीं. वह उसी के साथ अधिकतर समय दिखती थीं. वह उसी के साथ जुड़े अपने किस्से सुनाती रहती थीं.
हालांकि उनका पोता-पोती के प्रति आकर्षण बेटे हेमंत भोसले के बच्चों से लेकर छोटे बेटे आनंद भोसले के पुत्र-पुत्री तक छिपा नहीं था. वह पेशेवर जिंदगी में जितनी अपने काम के प्रति पक्की थीं, उतनी ही पारिवारिक जीवन के लिए समर्पित थीं. उनकी बेटी वर्षा भोसले ने आत्महत्या की, जिसका उन्हें गहरा सदमा लगा, लेकिन वह उससे उबर कर जनाई के साथ कहीं खो गईं.
आशा भोसले ने जितना कष्ट अपने संगीत जीवन के आरंभ में सहन किया, उससे कहीं अधिक अपने निजी जीवन की परेशानियों से मुकाबला करने में बिताया. पिता के निधन के बाद परिवार की पहली जिम्मेदारी लता मंगेशकर ने निभाई. मगर उसी बीच 16 साल की उम्र में परिवार की सहमति के विरुद्ध एक चित्रकार गणपतराव भोसले से विवाह करना नई मुश्किलें आमंत्रित करने जैसा था.
उनके पहले विवाह के बाद तीन बच्चे हुए, किंतु वैवाहिक जीवन सुखद नहीं रहा. पुरानी सोच के ससुराल वालों को अपनी बहू का फिल्मों में गाना पसंद नहीं था. जिसके चलते उन्हें घरेलू हिंसा तक का शिकार होना पड़ा. वर्ष 1960 में उन्होंने अपने पहले पति से तलाक ले लिया और बच्चों के साथ अलग चली गईं.
मगर अलग होकर भी उन्होंने कभी भी अपना उपनाम नहीं बदला, क्योंकि इसी दौरान वह बदले नाम के साथ घर-घर में पहचान बना चुकी थीं. बाद में उन्होंने अपने लंबे पेशेवर रिश्ते के साथी राहुल देव बर्मन से विवाह कर लिया. वर्ष 1994 में बर्मन की भी हृदयाघात से मौत हो गई.
हालांकि आशा भोसले को साठ के दशक में एक स्थापित गायिका की पहचान मिल चुकी थी, लेकिन परिवार और पेशे के संघर्ष ने उन्हें हमेशा ही घेरे रखा. गायिकी में पहला मुकाबला उनका अपनी ही बड़ी बहन से था तो घर के किस्से छिपाए नहीं छिप रहे थे. घरेलू संघर्ष के बावजूद आशा भोसले की अपने कैरियर को शिखर पर ले जाने की जद्दोजहद कभी कम या कमजोर नहीं हुई.
उन्हें ऊंचाइयों पर ले जाने वाले ओपी नैयर, आरडी बर्मन जैसे वो संगीतकार थे, जिनका मराठी पृष्ठभूमि से कोई संबंध नहीं था. मगर आशाताई ने उनसे प्रगाढ़ रिश्ता बनाया और संगीत जगत को तो अद्भुत रचनाएं दीं ही, साथ ही अपनी स्वतंत्र पहचान को स्थापित किया. लगभग 20 देशी-विदेशी भाषाओं में गीत गाने के बावजूद वह मराठी गीत-संगीत से कभी दूर नहीं हुईं.
एक समय अपने पिताजी के नाट्य संगीत में साथ देने वाली आशा भोसले ने सुरेश भट से लेकर अनेक मराठी कवियों की रचनाओं को गाया. उनके गैरफिल्मी गीत घर-घर में सुने गए. ब्रिटिश कलाकार ब्वॉय जार्ज के साथ गाने वाली आशा भोसले रसोई में मराठी पकवानों को बनाने में कोई संकोच नहीं करती थीं.
लंबा फिल्मी करियर होने के बावजूद ‘बाजीराव मस्तानी’ में मस्तानी का किरदार निभाने वाली दीपिका पादुकोण को अच्छी इसलिए नहीं कहती थीं, क्योंकि उन्होंने मस्तानी के बारे में जो किताबों में पढ़ा था, वैसी वह दिखती नहीं थीं. वह सुदेश भोसले और सचिन पिलगांवकर जैसे कलाकारों के साथ मंच पर नृत्य कर सकती थीं. उन्हें छोटे-बड़े किसी भी कलाकार के घर जाने में कोई संकोच नहीं था.
कुछ इसी कारण वह अपने जीवन के अंत समय तक लोगों के दिलों के इतने करीब थीं कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता शरद पवार जब एक बार अपना इलाज करा रहे थे, तब वह अस्पताल में उनके मराठी गीत सुनते थे. दरअसल आशा भोसले ने अपनी जिंदगी में दो जीवन जिये, एक पेशेवर गायिका और दूसरा मराठी संस्कृति में रचे-बसे इंसान का.
यही कुछ कारण है कि उनकी याद महानता के गुणगान के साथ नहीं, बल्कि अपनत्व की पहचान के साथ हो रही है. सोशल मीडिया पर उनके गाने से अधिक उनके व्यक्तित्व की चर्चा है. कोई अलग-अलग तरह की तस्वीरें दिखा रहा है, तो कोई साक्षात्कारों में उनके बिंदास बोल सुना रहा है. उनका अपनी मिट्टी से लगाव लोगों के दिल में गहरा बसा नजर आ रहा है. यही अंतर ‘दीदी’ से ‘ताई’ रेखांकित ही नहीं, अमर होता चला जा रहा है.