आजादी के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की पड़ताल करती एक किताब

By डॉ शिवाकान्त बाजपेयी | Updated: April 18, 2026 07:06 IST2026-04-18T07:05:54+5:302026-04-18T07:06:16+5:30

इस उत्खनन से पता चला कि कालीबंगा सिंधु घाटी सभ्यता का एक महत्वपूर्ण केंद्र था, जहां से प्राचीन नगर योजना, मृदभांड, और अन्य कलाकृतियों के अवशेष मिले हैं.

book examining the Archaeological Survey of India after independence | आजादी के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की पड़ताल करती एक किताब

आजादी के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की पड़ताल करती एक किताब

देश के इतिहास और पुरातत्व को खोजने का काम करने वाली सरकारी संस्था भारतीय पुरातत्व  सर्वेक्षण एक महत्वपूर्ण प्रतिष्ठित सांस्कृतिक संगठन है. कम ही लोगों को यह पता होगा कि यह सबसे पुराने सरकारी महकमों में से एक है जिसकी स्थापना सन 1861 में हुई थी. और आज यह संगठन देश के केंद्रीय संरक्षित स्मारकों सहित विश्वधरोहर स्मारकों की देखरेख तो करता ही है, पड़ोसी देशों के स्मारकों के संरक्षण में भी सहायता प्रदान करता है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का इतिहास आजादी के पूर्व तथा आजादी के बाद का एक रोचक इतिहास है.

‘इंडियन आर्कियोलॉजी आफ्टर इंडिपेंडेंस : अमलानंद  घोष एंड हिज लीगेसी’ हिमांशु प्रभा रे और अजय यादव द्वारा लिखित एक महत्वपूर्ण पुस्तक है, जो कि अगस्त 2025 में प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशक राउटलेज समूह द्वारा प्रकाशित की गई है. यह पुस्तक भारतीय स्वतंत्रता के बाद के पहले दो दशकों में आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) के समक्ष आई चुनौतियों और सरकार की नीतियों में आए बदलावों पर केंद्रित है.

मूलतः यह पुस्तक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के विद्वान पूर्व महानिदेशक अमलानंद  घोष के पुरातात्विक कार्यों का तथ्यात्मक लेखा-जोखा है और विशेषकर भारतीय पुरातत्व के विकास में उनके योगदान को  प्रस्तुत करती है. प्रसंगवश पुस्तक घोष एवं अन्य पुराविदों के उनके ब्रिटिश अधिकारियों और भारतीय सहकर्मियों के साथ रोचक रिश्तों का भी जिक्र करती है.

वस्तुतः यह पुस्तक अमलानंद घोष की डायरी और उनके नोट्स, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में एवं अन्य उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों तथा उनके बेटे असीम घोष द्वारा प्रदत्त जानकारी के आधार पर तैयार की गई है तथा ऐसे अनेक महत्वपूर्ण पहलुओं का उजागर करती है जो पहले कभी सामने ही नहीं आ पाए.  

कुल नौ अध्यायों और 225 पृष्ठों वाली यह पुस्तक एएसआई के विकास, वैश्विक वातावरण में इसकी भूमिका और आर्थिक विकास की नई वास्तविकताओं जैसे बड़े बांध निर्माणों के कारण जलमग्न होने वाली पुरासम्पदाओं का भी विश्लेषण करती है.

इस पुस्तक में अमलानंद  घोष के कार्यकाल (1953-68) के दौरान अर्थात भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के महानिदेशक के रूप में उनके द्वारा प्रदत्त महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित किया गया है. उनके कार्यकाल में ही उनके द्वारा कालीबंगा जैसे महत्वपूर्ण पुरास्थल की खोज  की गई. यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बंटवारे के बाद सिंधु घाटी सभ्यता के महत्वपूर्ण केंद्र हड़प्पा और मोहनजोदारो पाकिस्तान का हिस्सा हो गए थे.  

उस दौर में अमलानंद  घोष ने 1952 में कालीबंगा जैसे महत्वपूर्ण पुरास्थल की खोज की और 1961-69 के दौरान बी.बी. लाल और बी.के. थापर के साथ उन्होंने वहां पर उत्खनन भी किया. इस उत्खनन से पता चला कि कालीबंगा सिंधु घाटी सभ्यता का एक महत्वपूर्ण केंद्र था, जहां से प्राचीन नगर योजना, मृदभांड, और अन्य कलाकृतियों के अवशेष मिले हैं.

बीकानेर सर्वे और सरस्वती नदी के किनारे की खोज पर उनका काम विशेष रूप से उल्लेखनीय था.
इस पुस्तक की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें देश के लगभग सभी महत्वपूर्ण पुराविदों का और उनसे संबंधित घटनाओं का उल्लेख हुआ है.

Web Title: book examining the Archaeological Survey of India after independence

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