Acharya Vinoba Bhave: भूदान: भूमि, न्याय और नैतिकता की पुकार

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: April 18, 2026 06:10 IST2026-04-18T06:10:55+5:302026-04-18T06:10:55+5:30

Acharya Vinoba Bhave: भूदान आंदोलन की शुरुआत एक साधारण, लेकिन गहरे सामाजिक प्रश्न से हुई थी - क्या समाज अपने ही भूमिहीन लोगों के लिए स्वेच्छा से संसाधन साझा कर सकता है?

Acharya Vinoba Bhave 18 april 1951 Bhoodan Call Land, Justice and Morality blog Kumar Siddharth | Acharya Vinoba Bhave: भूदान: भूमि, न्याय और नैतिकता की पुकार

Vinoba

Highlights1951 में तेलंगाना के पोचमपल्ली गांव से इस आंदोलन की शुरुआत हुई थी.महत्‍व और वर्तमान संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता पर पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है.विनोबा भावे ने व्यापक पदयात्राएं कीं, जो इस आंदोलन की आत्मा बन गईं.

कुमार सिद्धार्थ

देश के सामाजिक और नैतिक इतिहास में ऐसे कुछ आंदोलन हुए हैं, जिन्होंने बिना हिंसा, बिना सत्ता और बिना संसाधनों के भी समाज की आत्मा को झकझोर दिया है. आचार्य विनोबा भावे का भूदान आंदोलन ऐसा ही एक अद्वितीय प्रयोग था, जिसने न केवल भूमि के पुनर्वितरण का प्रश्न उठाया, बल्कि समाज के नैतिक पुनर्निर्माण की दिशा भी दिखाई. 18 अप्रैल को मनाया जाने वाला ‘भूदान दिवस’ उस ऐतिहासिक क्षण की याद दिलाता है, जब 1951 में तेलंगाना के पोचमपल्ली गांव से इस आंदोलन की शुरुआत हुई थी.

अब जब इस आंदोलन के लगभग 75 वर्ष पूर्ण होने को हैं, इसके महत्‍व और वर्तमान संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता पर पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है. भूदान आंदोलन की शुरुआत एक साधारण, लेकिन गहरे सामाजिक प्रश्न से हुई थी - क्या समाज अपने ही भूमिहीन लोगों के लिए स्वेच्छा से संसाधन साझा कर सकता है?

पोचमपल्ली में जब भूमिहीन परिवारों ने विनोबा भावे से भूमि की मांग की, तब एक जमींदार द्वारा स्वेच्छा से भूमि-दान की घोषणा ने इस आंदोलन को जन्म दिया. विनोबा भावे ने इसे केवल भूमि-दान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे ‘सर्वोदय’ यानी सभी के उत्थान के व्यापक दर्शन से जोड़ा. भूदान आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने के लिए विनोबा भावे ने व्यापक पदयात्राएं कीं, जो इस आंदोलन की आत्मा बन गईं.

उन्होंने लगभग 13 वर्षों (1951 से 1964 के बीच) तक देशभर में पदयात्रा की और करीब 58,000 से अधिक किलोमीटर पैदल चलकर देश के 16 से अधिक राज्यों का भ्रमण किया तथा हजारों गांवों में पहुंचकर लोगों से सीधे संवाद किया. इन पदयात्राओं के माध्यम से उन्होंने न केवल भूमि-दान का आह्वान किया, बल्कि समाज में समानता, सहयोग और अहिंसक परिवर्तन की भावना को भी गहराई से स्थापित किया.

आगे चलकर यह आंदोलन ‘ग्रामदान’ की अवधारणा तक विस्तारित हुआ, जिसमें पूरे गांव की भूमि को सामूहिक स्वामित्व और उपयोग के लिए समर्पित करने का विचार सामने आया. वर्तमान समय में भूमि असमानता का प्रश्न नए रूप में सामने आ रहा है. एक ओर बड़े कॉरपोरेट और उद्योग समूह विशाल भूमि पर अधिकार रखते हैं,

वहीं दूसरी ओर लाखों किसान और आदिवासी समुदाय भूमि से वंचित या विस्थापन के खतरे में हैं. शहरीकरण और औद्योगीकरण के बढ़ते दबाव ने भूमि को केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि एक ‘वस्तु’ में बदल दिया है, जिसका मूल्य बाजार तय करता है, जिससे सामाजिक असमानता और गहरी होती जा रही है.

ऐसे में भूदान आंदोलन याद दिलाता है कि भूमि केवल आर्थिक संपत्ति नहीं है, बल्कि यह जीवन, संस्कृति और अस्तित्व का आधार है. विनोबा भावे का दृष्टिकोण सिखाता है कि विकास का मॉडल केवल आर्थिक लाभ पर आधारित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें सामाजिक न्याय और नैतिकता का भी समावेश होना चाहिए.  

Web Title: Acharya Vinoba Bhave 18 april 1951 Bhoodan Call Land, Justice and Morality blog Kumar Siddharth

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