वामपंथ ने अपनी आखिरी सरकार भी गंवाई 

By कृष्ण प्रताप सिंह | Updated: May 7, 2026 07:47 IST2026-05-07T07:46:42+5:302026-05-07T07:47:50+5:30

इस परीक्षण के अभाव  का ही नतीजा है कि लगभग एक साथ सक्रिय होने वाली दो जमातों में जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कहा कि वह राजनीति से परे रहकर संस्कृति के ही क्षेत्र में काम करेगा, उसने काम करते-करते अपने राजनीतिक फ्रंट की मार्फत लगभग सम्पूर्ण देश की राजनीति पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है

communist party of india Left also lost its last government | वामपंथ ने अपनी आखिरी सरकार भी गंवाई 

वामपंथ ने अपनी आखिरी सरकार भी गंवाई 

पश्चिम बंगाल के शोर में केरल विधानसभा चुनाव के नतीजों की ओर देश का कुछ कम ही ध्यान जा रहा है - हालांकि राजनीतिक लिहाज से वे भी कुछ कम महत्वपूर्ण नहीं हैं. कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के हाथों वाम लोकतांत्रिक मोर्चे की करारी हार के बाद वहां के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के इस्तीफे के साथ ही देश में वामपंथी सरकारों का दौर समाप्त हो गया है.

यह पांच साल पहले ही खत्म हो जाता, अगर पिछले  विधानसभा चुनाव में विजयन के कामकाज से खुश केरल के मतदाता उन्हें ‘बख्श’ नहीं देते. लेकिन इस बार उनकी छवि भी उनकी सत्ता नहीं बचा पाई और वे ‘अब तक के आखिरी वामपंथी मुख्यमंत्री’ के रूप में भूतपूर्व हो गए.

यहां याद किया जाना चाहिए कि ई.एम.एस. नंबूदरीपाद के मुख्यमंत्रित्व में देश की पहली वामपंथी सरकार भी 5 अप्रैल, 1957 को इसी राज्य में बनी थी, उसके राज्य बनने के बाद हुए पहले ही विधानसभा चुनाव में. और इस मायने में अभूतपूर्व थी कि उसके रूप में न केवल भारत, बल्कि दुनिया में कहीं भी पहली बार किसी कम्युनिस्ट पार्टी को लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव में सत्ता हासिल हुई थी.

सच कहें तो वामदलों के नेता संसदीय कहें अथवा चुनावी राजनीति में उतरे तो उसे अपनी क्रांतिकामना के लिए इस्तेमाल करने के मंसूबे से थे, मगर समय के साथ खुद उसके हाथों इस्तेमाल होकर रह गए हैं. इतना ही नहीं, आजादी के बाद जतन से विकसित की गई ‘सारी मध्यवर्गी पार्टियों के सबसे प्रतिबद्ध वैचारिक प्रतिपक्ष’ की अपनी छवि भी वे नहीं बचा पाए हैं.

आज वामदलों में एका के बजाय बिखराव बढ़ता जा रहा है और कई कम्युनिस्ट पार्टियां अपने महासचिवों की जेबों में रहकर उनकी बौद्धिक भूख के शमन का जरिया भर रह गई हैं. दूसरी ओर कई वामपंथी पार्टियों के नेता उतने भी प्रतिबद्ध या ‘मेंटली इक्विप्ड’ नहीं रह गए हैं, जितने कभी उनके साधारण कार्यकर्ता हुआ करते थे.

उन्होंने एक दूजे के लिए बुर्जुआ, संशोधनवादी, सुधारवादी और संसदवादी आदि एक से बढ़कर एक गालियां विकसित कर डाली हैं और उन्हें लेकर अपने ही शिविर में ‘हत्याएं’ करते रहते हैं. माकपा से जुड़े अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने तो एक समय अपनी ही पार्टी की केरल इकाई पर ‘सामंती स्टालिनवाद’ और उदारवाद की वर्चस्वता की शिकार होने की तोहमत लगाई थी.

सच्ची बात  तो यह है कि आज वामदलों को पुनर्जीवन के लिए नए फार्मूलेशनों और रणनीतियों की बेहद सख्त जरूरत है क्योंकि पुरानी कम्युनिस्ट थीसिसों का नए बदलावों के परिप्रेक्ष्य में युगानुरूप परीक्षण किए बिना उनकी बात नहीं बनने वाली है. इस परीक्षण के अभाव  का ही नतीजा है कि लगभग एक साथ सक्रिय होने वाली दो जमातों में जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कहा कि वह राजनीति से परे रहकर संस्कृति के ही क्षेत्र में काम करेगा, उसने काम करते-करते अपने राजनीतिक फ्रंट की मार्फत लगभग सम्पूर्ण देश की राजनीति पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है और  संस्कृति के क्षेत्र में काम से परहेज कर चौबीसों घंटे जनपक्षधर राजनीति करने वाली कम्युनिस्ट पार्टियां राजनीति के हाशिये में चली जा रही हैं.

जो दलित व पिछड़े कभी वामपंथ के आधार थे, निराश होकर उनके भी कुछ हिस्से यह तक आरोप लगा रहे हैं कि वामपंथी दल क्रांति करने नहीं, क्रांति रोकने के लिए प्रतिबद्ध हैं और वर्ग के चक्कर में उन्होंने वर्ण की हकीकतों को किंचित भी नहीं समझा है. फिर? आगे कौन हवाल?

Web Title: communist party of india Left also lost its last government

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