मीथेन : रिसाव दिखता नहीं, लेकिन असर रुकता नहीं
By निशांत | Updated: May 7, 2026 07:06 IST2026-05-07T07:06:37+5:302026-05-07T07:06:37+5:30
रिपोर्ट कहती है कि 2025 में ऊर्जा क्षेत्र से मीथेन एमिशन लगभग रिकॉर्ड स्तर पर बना रहा. यानी दुनिया बात तो कर रही है कटौती की, लेकिन जमीन पर बदलाव अभी भी धीमा है.

मीथेन : रिसाव दिखता नहीं, लेकिन असर रुकता नहीं
दुनिया इस वक्त ऊर्जा संकट और जलवायु संकट, दोनों के बीच खड़ी है. एक तरफ गैस की कमी की चिंता है, दूसरी तरफ वही गैस हवा में बेवजह उड़ रही है. यह विरोधाभास अब और साफ दिखने लगा है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ( आईईए) की नई रिपोर्ट ग्लोबल मीथेन ट्रैकर 2026 इसी कहानी को सामने लाती है. रिपोर्ट कहती है कि 2025 में ऊर्जा क्षेत्र से मीथेन एमिशन लगभग रिकॉर्ड स्तर पर बना रहा. यानी दुनिया बात तो कर रही है कटौती की, लेकिन जमीन पर बदलाव अभी भी धीमा है.
मीथेन को अक्सर ‘कम दिखने वाली गैस’ कहा जाता है. यह कार्बन डाइऑक्साइड जितनी चर्चा में नहीं रहती, लेकिन गर्मी बढ़ाने की इसकी क्षमता कई गुना ज्यादा होती है. और यह रिसाव अक्सर उन जगहों पर होता है जहां से ऊर्जा निकलती है, तेल के कुएं, गैस पाइपलाइन, कोयला खदानें. रिपोर्ट एक सीधी बात कहती है, यह सिर्फ क्लाइमेट का मुद्दा नहीं है, यह ऊर्जा सुरक्षा का भी सवाल है.
पिछले महीनों में पश्चिम एशिया में तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य लगभग बंद होने की स्थिति में पहुंच गया. इससे दुनिया की करीब 20 फीसदी एलएनजी सप्लाई प्रभावित हुई. ऐसे समय में अगर मीथेन को रोका जाए, तो वही गैस जो आज हवा में जा रही है, बाजार में आ सकती है. रिपोर्ट के मुताबिक, अगर देश मौजूदा तकनीकों का इस्तेमाल करे तो हर साल करीब 200 बिलियन क्यूबिक मीटर गैस बचाई जा सकती है.
यह मात्रा उस सप्लाई से भी दोगुनी है, जो हाल के संकट में प्रभावित हुई. यानी कहानी सिर्फ नुकसान की नहीं है, मौका भी उतना ही बड़ा है. आईईए के मुख्य ऊर्जा अर्थशास्त्री टिम गोल्ड कहते हैं, “लक्ष्य तय करना पहला कदम है. असली चुनौती है उन्हें जमीन पर उतारना. मीथेन को कम करना सिर्फ जलवायु के लिए नहीं, ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी जरूरी है.”
रिपोर्ट बताती है कि करीब 70 फीसदी मीथेन एमिशन को आज की तकनीकों से कम किया जा सकता है. और इसमें से एक बड़ा हिस्सा बिना किसी अतिरिक्त लागत के भी रोका जा सकता है. फिर सवाल उठता है, अगर समाधान मौजूद हैं तो समस्या बनी क्यों है? जवाब थोड़ा असहज है. दुनिया के ज्यादातर देश और कंपनियां अभी भी ‘वादा’ और ‘कार्रवाई’ के बीच फंसे हुए हैं. रिपोर्ट इसे ‘इम्प्लीमेंटेशन गैप’ कहती है.
कोयला इस कहानी का एक बड़ा किरदार है, लेकिन अक्सर चर्चा से बाहर रहता है. ऊर्जा थिंक टैंक एम्बर की विश्लेषक डाॅ. सबीना आसान साफ कहती हैं, ‘कोयला मीथेन का बड़ा स्रोत है, लेकिन इसे नजरअंदाज किया जा रहा है. जबकि इसे कम करना सबसे आसान और सस्ता तरीका है.’ भारत जैसे देशों के लिए यह और भी अहम हो जाता है. यह कहानी तकनीक की भी है, लेकिन उससे ज्यादा प्राथमिकताओं की है.
ऊर्जा की दुनिया में हम अक्सर नई खोजों, नई परियोजनाओं और नई सप्लाई की बात करते हैं. लेकिन यह रिपोर्ट एक अलग दिशा में इशारा करती है, कभी-कभी सबसे बड़ा समाधान नई चीज बनाने में नहीं, जो पहले से है उसे बचाने में होता है. मीथेन का हर रिसाव सिर्फ एक गैस का नुकसान नहीं है. यह एक छूटी हुई ऊर्जा है, एक बढ़ती हुई गर्मी है, और एक ऐसा मौका है जिसे हम बार-बार टाल रहे हैं. सवाल है कि जब समाधान हमारे पास हैं, तो हम इंतजार किस बात का कर रहे हैं?